| باغ در ایام بهاران خوش است | موسم گل با رخ یاران خوشست | |
| چون گل نوروز کند نافه باز | نرگس سرمست در آید به ناز | |
| سبزه برآرد خط عاشق فریب | از دل بیننده رباید شکیب | |
| برگ شود بر گل نسرین فراخ | آب چکد ز ابر بر اندام شاخ | |
| سرو تر اندام ز لطف صبا | از خز بیتار بپوشد قبا | |
| تازه شود لاله چو رخسار دوست | غنچهی نوخیز نگنجد به پوست | |
| بر رخ گل غازه کند لاله زار | جلوهکنان دست برآرد چنار | |
| از خط سنبل که معنبر شود | خاک چمن غالیهیتر شود | |
| ابر بگرید به رخ بوستان | باغ بخندد چو لب دوستان | |
| تا بنهد بر جگر لاله داغ | گل همه از باد فروزد چراغ | |
| بط ز ترانه که برود آورد | فاختگان را به سرود آورد | |
| گر چه کند مرغ ز مستی خروش | نیز نهد بر سر گل پا به هوش | |
| با ز چو گل رخت بریزد ز خار | خنده فراموش کند لالهزار | |
| باغ دهد حله رنگین به باد | غنچه ببندد لب شیرن کشاد | |
| سرو سرافراشته پست اوفتد | در ورق لاله شکست اوفتد | |
| نافه شکوفه ندهد بوی مشک | پر شکند فاخته از شاخ خشک | |
| مرغ خورد بر گل نسرین دریغ | باد بیارد به سر سبزه تیغ | |
| نسترن از شاخ درافتد نگون | خشک شود در جگر لاله خون | |
| سرد شود چشمه چو افسردگان | زرد شود سبزه چو گل خوردگان | |
| شاخ بنفشه که ز جا بر شود | کز دمهی دیده عبهر شود |